श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 78-79
 
 
श्लोक  3.183.78-79 
तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा।
फलत्यथ सुखार्हो वा दु:खार्हो वाथ जायते॥ ७८॥
कृतान्तविधिसंयुक्त: स जन्तुर्लक्षणै: शुभै:।
अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभि:॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
वहाँ दूसरे भौतिक शरीर में उसके पूर्वजन्म के कर्म छाया की तरह सदैव उसका पीछा करते हैं और समय आने पर अपना फल देते हैं। अतः आत्मा सुख-दुःख भोगने में समर्थ होकर जन्म लेती है। यमराज के विधान (अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगने) में नियुक्त आत्मा अपने शुभ-अशुभ गुणों के कारण प्राप्त सुख-दुःख से मुक्त नहीं हो पाती। इस तथ्य को ज्ञान-दृष्टि वाले महापुरुष देखते हैं। 78-79।
 
There in the other physical body, the deeds of his previous life always follow him like a shadow and give their results in due course. Therefore, the soul is born capable of experiencing happiness or sorrow. The soul, which is appointed to the law of Yamaraja (enjoying the fruits of good and bad deeds), is unable to get rid of the happiness or sorrow received by him by his auspicious or inauspicious characteristics. This fact is seen by the great men who have the vision of knowledge. 78-79.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)