श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 76-77
 
 
श्लोक  3.183.76-77 
अयमादिशरीरेण देवसृष्टेन मानव:।
शुभानामशुभानां च कुरुते संचयं महत्॥ ७६॥
आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्रायं कलेवरम्।
सम्भवत्येव युगपद् योनौ नास्त्यन्तराभव:॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
यह मनुष्य ईश्वर द्वारा निर्मित पूर्व शरीर के माध्यम से (अपने अन्तःकरण में) बहुत-सा शुभ-अशुभ कर्म संचित करता है। फिर जब उसकी आयु पूरी हो जाती है, तो वह इस जीर्ण-शीर्ण भौतिक शरीर को त्यागकर उसी क्षण दूसरे शरीर में प्रकट होता है। एक शरीर को त्यागने और दूसरा शरीर ग्रहण करने के बीच वह क्षण भर के लिए भी अशरीरी नहीं होता। 76-77
 
This human being accumulates a large amount of good and bad deeds (in his conscience) through the previous body created by God. Then, when his life span is over, he leaves this old and worn out physical body and appears in another body at the same moment. He does not become non-corporeal even for a moment between leaving one body and accepting another. 76-77.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)