श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 74-75
 
 
श्लोक  3.183.74-75 
जन्तो: प्रेतस्य कौन्तेय गति: स्वैरिह कर्मभि:।
प्राज्ञस्य हीनबुद्धेश्च कर्मकोश: क्व तिष्ठति॥ ७४॥
क्वस्थस्तत् समुपाश्नाति सुकृतं यदि वेतरत्।
इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनयं शृणु॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती नन्दन! इस संसार में मृत्यु के पश्चात् जीवों की गति उनके अपने-अपने कर्मों के अनुसार होती है। किन्तु ज्ञानी और अज्ञानी का कर्म मृत्यु के पश्चात् कहाँ रहता है? वह कहाँ रहकर शुभ या अशुभ कर्मों का फल भोगता है? इस दृष्टि से तुम्हारे पूछे हुए प्रश्न के उत्तर में मैं तुम्हें तत्त्व बता रहा हूँ, सुनो। ॥74-75॥
 
Kunti Nandan! In this world, after death, the movement of the living beings is according to their respective deeds. But where does the karma of the knowledgeable and the ignorant remain after death? Where does it remain and enjoy the fruits of good or bad deeds? From this point of view, I am telling you the principle in answer to the question you have asked, listen. ॥ 74-75॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)