श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  3.183.73 
भवन्त्यल्पायुष: पापा रौद्रकर्मफलोदया:।
नाथन्त: सर्वकामानां नास्तिका भिन्नचेतस:॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार, पापकर्मों में लिप्त पापियों की आयु उनके कर्मों के अनुसार बहुत कम हो गई। उनके पापकर्मों के भयंकर परिणाम सामने आने लगे। वे अपनी सभी इच्छित वस्तुओं के लिए दूसरों से याचना करने लगे। अनेक लोग नास्तिक हो गए और व्याकुल हो गए। 73.
 
In this way, the lifespan of sinners who indulged in sinful activities got reduced considerably according to their karma. The terrible results of their sinful activities started to appear. They started to beg others for all their desired things. Many became atheists and became distraught. 73.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)