श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.183.72 
अशुभै: कर्मभिश्चापि प्रायश: परिचिह्निता:।
दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानोऽप्रतापिन:॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
उनके शरीर पर प्रायः उनके अशुभ कर्मों (कोढ़ आदि) के चिन्ह प्रकट होने लगे। कुछ लोग नीच कुल में उत्पन्न हुए, कुछ लोग अनेक रोगों से ग्रस्त हो गए और कुछ दुष्ट स्वभाव के हो गए। उनमें से कोई भी प्रतापी नहीं हुआ। 72.
 
Often the signs of their inauspicious deeds (leprosy etc.) started appearing on their bodies. Some were born in lowly families, some were afflicted with many diseases and some became evil-natured. None of them became majestic. 72.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)