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mahabharat 3.183.68-69: तत्पश्चात्, कुछ समय पश्चात् पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य काम और क्रोध से ग्रस्त हो गए। वे छल-कपट और अहंकार से अपनी जीविका चलाने लगे। लोभ और मोह ने उनके मन पर विजय प्राप्त कर ली। इन दोषों के कारण, न चाहते हुए भी उन्हें अपना शरीर त्यागना पड़ा। 68-69   |   mahabharat अध्याय 3.183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 68-69
 
 
श्लोक  3.183.68-69 
तत: कालान्तरेऽन्यस्मिन् पृथिवीतलचारिण:॥ ६८॥
कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविन:।
लोभमोहाभिभूताश्च त्यक्ता देहैस्ततो नरा:॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, कुछ समय पश्चात् पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य काम और क्रोध से ग्रस्त हो गए। वे छल-कपट और अहंकार से अपनी जीविका चलाने लगे। लोभ और मोह ने उनके मन पर विजय प्राप्त कर ली। इन दोषों के कारण, न चाहते हुए भी उन्हें अपना शरीर त्यागना पड़ा। 68-69
 
Thereafter, after some time, the human beings living on the earth were overcome by lust and anger. They started earning their livelihood by deceit and arrogance. Greed and attachment overpowered their minds. Due to these defects, they were forced to give up their bodies even though they did not want to. 68-69.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)