श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  3.183.62 
अत्र ते कथयिष्यामि तदिहैकमना: शृणु।
यथेहामुत्र च नर: सुखदु:खमुपाश्नुते॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य इस लोक और परलोक में किस प्रकार सुख-दुःख का अनुभव करता है, इस विषय में मैं अपना मत तुम्हें बताता हूँ। एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥62॥
 
I will tell you my opinion about the way a man experiences happiness and sorrow in this world and the next. Listen with concentration. ॥ 62॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)