श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  3.183.60 
ऐहलौकिकमेवेह उताहो पारलौकिकम्।
क्व च कर्माणि तिष्ठन्ति जन्तो: प्रेतस्य भार्गव॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
भृगुनन्दन! कर्मों का फल इस लोक में मिलता है या परलोक में? जीव के मरने के बाद उसके कर्म कहाँ रहते हैं? 60॥
 
Bhrigunandan! Is the fruit of one's deeds received in this world or in the next world? Where do the deeds of a living being remain after its death?' 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)