श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  3.183.57-58 
कर्मण: पुरुष: कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य वा।
स फलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वर:॥ ५७॥
कुतो वा सुखदु:खेषु नृणां ब्रह्मविदां वर।
इह वा कृतमन्वेति परदेहेऽथ वा पुन:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
मैं सोचता हूँ कि शुभ-अशुभ कर्म करने वाला मनुष्य किस प्रकार अपने कर्मों का फल भोगता है और ईश्वर उन कर्मों का रचयिता कैसे है? हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ऋषि! मनुष्य सुख-दुःख देने वाले कर्मों में कैसे प्रवृत्त होते हैं? क्या मनुष्य का कर्म इस लोक में अथवा परलोक में भी उसका पीछा करता है?॥ 57-58॥
 
‘I wonder, how does a man who performs good and bad deeds enjoy the fruits of his deeds and how is God the creator of those deeds? O great sage among the knowers of Brahman! How do men tend to do deeds that bring happiness and sorrow? Does the deed of a man follow him in this world or in the other worldly body as well?॥ 57-58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)