कर्मण: पुरुष: कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य वा।
स फलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वर:॥ ५७॥
कुतो वा सुखदु:खेषु नृणां ब्रह्मविदां वर।
इह वा कृतमन्वेति परदेहेऽथ वा पुन:॥ ५८॥
अनुवाद
मैं सोचता हूँ कि शुभ-अशुभ कर्म करने वाला मनुष्य किस प्रकार अपने कर्मों का फल भोगता है और ईश्वर उन कर्मों का रचयिता कैसे है? हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ऋषि! मनुष्य सुख-दुःख देने वाले कर्मों में कैसे प्रवृत्त होते हैं? क्या मनुष्य का कर्म इस लोक में अथवा परलोक में भी उसका पीछा करता है?॥ 57-58॥
‘I wonder, how does a man who performs good and bad deeds enjoy the fruits of his deeds and how is God the creator of those deeds? O great sage among the knowers of Brahman! How do men tend to do deeds that bring happiness and sorrow? Does the deed of a man follow him in this world or in the other worldly body as well?॥ 57-58॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)