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mahabharat 3.183.56: ब्रह्मन्! जब मैं अपने को सुख से वंचित पाता हूँ और धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों को सब प्रकार से उन्नति करते देखता हूँ, तब मेरे मन में स्वभावतः ही एक विचार उत्पन्न होता है ॥ 56॥   |   mahabharat अध्याय 3.183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.183.56 
भवत्येव हि मे बुद्धिर्दृष्ट्वाऽऽत्मानं सुखाच्च्युतम्।
धार्तराष्ट्रांश्च दुर्वृत्तानृध्यत: प्रेक्ष्य सर्वश:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मन्! जब मैं अपने को सुख से वंचित पाता हूँ और धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों को सब प्रकार से उन्नति करते देखता हूँ, तब मेरे मन में स्वभावतः ही एक विचार उत्पन्न होता है ॥ 56॥
 
Brahman! When I find myself deprived of happiness and see the wicked sons of Dhritarashtra prospering in every way, then naturally a thought arises in my mind. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)