श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.183.50 
उवाच चैनं कालज्ञ: स्मयन्निव सनातन:।
ब्रह्मर्षे कथ्यतां यत् ते पाण्डवेषु विवक्षितम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
उस समय पूर्वोक्त प्रसंग के ज्ञाता सनातन भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए मार्कण्डेयजी से कहा - 'महर्षि! आप पाण्डवों से जो कुछ कहना चाहते थे, कह दीजिए ॥50॥
 
At that time, the eternal Lord Shri Krishna, the knower of the above mentioned occasion, said to Markandeyaji with a smile – 'Maharshe! Whatever you wanted to say to the Pandavas, say it. 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)