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mahabharat 3.183.47: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब सब लोग वहाँ बैठे थे, तब शुद्ध हृदय वाले नारद मुनि भी पाण्डवों से मिलने के लिए वहाँ आये।   |   mahabharat अध्याय 3.183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.183.47 
वैशम्पायन उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारद:।
आजगाम विशुद्धात्मा पाण्डवानवलोकक:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब सब लोग वहाँ बैठे थे, तब शुद्ध हृदय वाले नारद मुनि भी पाण्डवों से मिलने के लिए वहाँ आये।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! While all the people were sitting there, the sage Narada, who had a pure heart, also came there to meet the Pandavas. 47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)