श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.183.34 
प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्र:
सुयोधन: पापकृतां वरिष्ठ:।
स सानुबन्ध: ससुहृद्‍गणश्च
भौमस्य सौभाधिपतेश्च मार्गम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! अब पापात्माओं के शिरोमणि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन को उसके बन्धु-बान्धवों सहित उसी मार्ग पर भेज दो, जहाँ भौमासुर और शाल्व गए हैं॥34॥
 
Pandunandan! Now send Dhritarashtra's son Duryodhana, the crown of sinful souls, along with his friends and relatives on the same path where Bhaumasura and Shalva have gone. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)