श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.183.33 
आवर्ततां कार्मुकवेगवाता
हलायुधप्रग्रहणा मधूनाम्।
सेना तवार्थेषु नरेन्द्र यत्ता
ससादिपत्त्यश्वरथा सनागा॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
राजन! जिसका धनुष वायु के वेग के समान तीव्र है, जिसके सेनापति हलधारी बलरामजी हैं, वह मथुरा क्षेत्र की गोपों की चतुर्भुज सेना, घुड़सवार, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों से युक्त, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहती है और आपकी मनोकामना पूर्ण करने के लिए सदैव तत्पर रहती है॥ 33॥
 
King! The one whose bow is as fast as the speed of the wind, the one whose commander is Balarama holding a plough, that four-fold army of the Gopas from the region of Mathura, filled with horsemen, elephants, horses, chariots and foot soldiers, is always prepared for war and is always ready to fulfill your desires.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)