श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.183.32 
अथाब्रवीद् धर्मराजं तु कृष्णो
दशार्हयोधा: कुकुरान्धकाश्च।
एते निदेशं तव पालयन्त-
स्तिष्ठन्तु यत्रेच्छसि तत्र राजन्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा - 'हे राजन्! दशार्ह, कुकुर और अन्धकवंश के योद्धा आपकी आज्ञा मानकर जहाँ चाहें, वहाँ खड़े हो सकते हैं॥32॥
 
After that Lord Shri Krishna said to Dharmaraja Yudhishthir - 'O King! The warriors of Dasharha, Kukur and Andhakavansh can stand wherever you want, following your orders. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)