श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.183.31 
यदा विहारं प्रसमीक्षमाणा:
प्रयान्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि।
एकैकमेषामनुयान्ति तत्र
रथाश्च यानानि च दन्तिनश्च॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
यज्ञसेनी! जब आपके पुत्र नगर की शोभा देखने के लिए निकलते हैं, तब रथ, घोड़े, हाथी, पालकियाँ आदि उनके पीछे-पीछे चलते हैं।’ ॥31॥
 
Yajnaseni! When your sons go out to see the beauty of the city, chariots, horses, elephants, palanquins etc. follow each one of them.' ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)