श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.183.29 
गदासिचर्मग्रहणेषु शूरा-
नस्त्रेषु शिक्षासु रथाश्वयाने।
सम्यग् विनेता विनयत्यतन्द्र-
स्तांश्चाभिमन्यु: सततं कुमार:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'शिक्षा देने में निपुण और आलस्य से रहित कुमार अभिमन्यु आपके वीर पुत्रों को गदा, ढाल और तलवार की विद्या सिखाते हैं। वे उन्हें अन्य अस्त्र-शस्त्र भी सिखाते हैं। इसके साथ ही वे उन्हें रथ और घोड़े चलाने की कला भी सिखाते हैं। वे उनकी शिक्षा में सदैव तत्पर रहते हैं।॥29॥
 
‘Kumar Abhimanyu, who is adept in teaching and is free from laziness, teaches your valiant sons the tricks of mace, shield and sword. He also teaches them other weapons. Along with this, he also teaches them the art of driving chariots and horses. He is always engaged in their education.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)