श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.183.28 
यथानिरुद्धस्य यथाभिमन्यो-
र्यथा सुनीथस्य यथैव भानो:।
तथा विनेता च गतिश्च कृष्णे
तवात्मजानामपि रौक्मिणेय:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण! जिस प्रकार रुक्मिणीनंदन प्रद्युम्न अनिरुद्ध, अभिमन्यु, सुनीत और भानु को धनुर्वेद की शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार वे आपके पुत्रों के भी गुरु और रक्षक हैं॥28॥
 
Krishna. Just as Rukmini Nandan Pradyumna teaches Dhanurveda to Anirudh, Abhimanyu, Sunith and Bhanu, in the same way he is the teacher and protector of your sons also. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)