श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.183.25 
राज्येन राष्ट्रैश्च निमन्त्र्यमाणा:
पित्रा च कृष्णे तव सोदरैश्च।
न यज्ञसेनस्य न मातुलानां
गृहेषु बाला रतिमाप्नुवन्ति॥ २५॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण! तुम्हारे पिता और भाइयों ने तुम्हें राज्य के सुख-सुविधाएँ और राजसी साधन-वाहन आदि दिखाकर अनेक बार आमंत्रित किया है, फिर भी तुम्हारे बच्चे अपने नाना यज्ञसेन और मामा धृष्टद्युम्न आदि के घर में रहना पसन्द नहीं करते-वहाँ रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता॥ 25॥
 
Krishna! Your father and brothers have invited you many times by showing the facilities of the kingdom and royal equipments - vehicles etc., but still your children do not like to stay in the houses of their maternal grandfather Yajnasen and maternal uncle Dhrishtadyumna etc. - they do not like staying there.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)