श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.183.20 
यदा जनौघ: कुरुजाङ्गलानां
कृष्णां सभायामवशामपश्यत्।
अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं
सहेत तत् पाण्डव कस्त्वदन्य:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुपुत्र! कुरुजाङ्गल देश के लोगों ने द्रौपदी को जिस असहाय अवस्था में द्यूतशाला में देखा था और उस समय उसके साथ जो पापपूर्ण व्यवहार किया गया था, उसे आपके अतिरिक्त और कौन सहन कर सकता था?॥ 20॥
 
Son of Pandu! Who other than you could have tolerated the helpless state in which Draupadi was seen in the gambling hall by the people of Kurujangala country and the sinful behavior that was meted out to her at that time?॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)