श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.183.19 
दानं च सत्यं च तपश्च राजन्
श्रद्धा च बुद्धिश्च क्षमा धृतिश्च।
अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा-
नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! राज्य, धन और सुखों को प्राप्त करके भी आपने दान, सत्य, तप, श्रद्धा, बुद्धि, क्षमा और धैर्य - इन गुणों को सदैव प्रिय माना है॥ 19॥
 
O King! Even after acquiring kingdom, wealth and pleasures you have always loved charity, truth, penance, faith, wisdom, forgiveness and patience - these virtues.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)