श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.183.16 
धर्म: पर: पाण्डव राज्यलाभात्
तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन्।
सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं
जितस्त्वयायं च परश्च लोक:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! हे पाण्डुपुत्र! धर्म राज्य प्राप्ति से भी बढ़कर है। धर्म की वृद्धि के लिए तप को प्रधान साधन कहा गया है। तुम सत्य और सरलता आदि गुणों सहित स्वधर्म का पालन करते हो, इसलिए तुमने इस लोक और परलोक दोनों पर विजय प्राप्त कर ली है॥ 16॥
 
‘O King! O son of Pandu! Dharma is greater than the attainment of a kingdom. Penance is said to be the main means for the growth of Dharma. You follow your own Dharma along with virtues like truth and simplicity, hence you have conquered both this world and the next.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)