श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.183.13 
कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वान्
धनंजयेनासुरतर्जनेन।
बभौ यथा भूतपतिर्महात्मा
समेत्य साक्षाद् भगवान् गुहेन॥ १३॥
 
 
अनुवाद
राक्षसों को भयभीत करने वाले सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से मिलकर उसी प्रकार शोभा पाते हैं, जैसे परम महात्मा भगवान भूतनाथ शंकर कार्तिकेय से मिलकर शोभा पाते हैं॥13॥
 
The omniscient Lord Shri Krishna, who frightens the demons, becomes beautiful by meeting Arjuna, in the same way as the Supreme Mahatma, Lord Bhootnath Shankar, becomes beautiful by meeting Kartikeya. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)