श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  3.183.1-3 
वैशम्पायन उवाच
काम्यकं प्राप्य कौरव्य युधिष्ठिरपुरोगमा:।
कृतातिथ्या मुनिगणैर्निषेदु: सह कृष्णया॥ १॥
ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसत: पाण्डुनन्दनान्।
ब्राह्मणा बहवस्तत्र समन्तात् पर्यवारयन्॥ २॥
अथाब्रवीद् द्विज: कश्चिदर्जुनस्य प्रिय: सखा।
स एष्यति महाबाहुर्वशी शौरिरुदारधी:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - हे कुरुपुत्र जनमेजय! काम्यकवन पहुँचने पर वहाँ के ऋषियों ने युधिष्ठिर आदि पाण्डवों का यथोचित आदर-सत्कार किया। फिर वे द्रौपदी सहित वहाँ रहने लगे। जब वे विश्वस्त पाण्डव वहाँ रहने लगे, तब बहुत से ब्राह्मणों ने आकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया (और उनके साथ रहने लगे)। तत्पश्चात एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने सूचना दी कि उदारचित्त महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण, जो सबको वश में रखने वाले और अर्जुन के प्रिय सखा हैं, शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे। 1-3।
 
Vaishampayana says - O son of Kuru, Janamejaya! On reaching Kamyakavana, the sages there gave due respect to Yudhishthira and other Pandavas. Then they started living there with Draupadi. ​​When those trusted Pandavas started living there, then many Brahmins came and surrounded them from all sides (and started living with them). Thereafter one day a Brahmin came. He gave the information that the generous-minded Mahabahu Lord Shri Krishna, who controls everyone and is Arjun's dear friend, will arrive here soon. 1-3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)