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mahabharat 3.182.6: वर्षा ऋतु की नदियाँ तेज़ गति से छोड़े गए तीरों की तरह कलकल करती हुई बहती थीं। उनका जल लहरें पैदा करता रहता था और अनेक वनों की शोभा बढ़ाता था।   |   mahabharat अध्याय 3.182: वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुन: द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.182.6 
क्षुब्धतोया महावेगा: श्वसमाना इवाशुगा:।
सिन्धव: शोभयांचक्रु: काननानि तपात्यये॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वर्षा ऋतु की नदियाँ तेज़ गति से छोड़े गए तीरों की तरह कलकल करती हुई बहती थीं। उनका जल लहरें पैदा करता रहता था और अनेक वनों की शोभा बढ़ाता था।
 
The rivers of the rainy season flowed with a whizzing sound like swift arrows shot with great speed. Their waters kept creating ripples and they added to the beauty of many forests.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)