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mahabharat 3.182.4: भूमि पर घास उग आई। मतवाले पशु और सर्प इधर-उधर विचरण करने लगे। पृथ्वी जल से अभिषिक्त हो गई और सबके लिए शांत और सुखद हो गई ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.182: वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुन: द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.182.4 
विरूढशष्पा धरणी मत्तदंशसरीसृपा।
बभूव पयसा सिक्ता शान्ता सर्वमनोरमा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
भूमि पर घास उग आई। मतवाले पशु और सर्प इधर-उधर विचरण करने लगे। पृथ्वी जल से अभिषिक्त हो गई और सबके लिए शांत और सुखद हो गई ॥4॥
 
Grass grew on the ground. Drunk animals and snakes started roaming around. The earth was anointed with water and became calm and pleasant for everyone. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)