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mahabharat 3.182.10-11: तत्पश्चात् आनन्ददायक शरद ऋतु आ गई । कौए और हंस आदि पक्षी विचरण करने लगे । वनों में और पर्वत शिखरों पर कास, कुश आदि की संख्या बहुत बढ़ गई थी । नदियों का जल स्वच्छ हो गया । आकाश के स्वच्छ होते ही तारों का प्रकाश भी अधिक हो गया । सर्वत्र मृग और पक्षी कलरव करने लगे । महात्मा पाण्डवों के लिए यह शरद ऋतु अत्यन्त सुखदायी थी ॥10-11॥   |   mahabharat अध्याय 3.182: वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुन: द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.182.10-11 
क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत् प्रमुदिताभवत्।
रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा॥ १०॥
विमलाकाशनक्षत्रा शरत् तेषां शिवाभवत्।
मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् आनन्ददायक शरद ऋतु आ गई । कौए और हंस आदि पक्षी विचरण करने लगे । वनों में और पर्वत शिखरों पर कास, कुश आदि की संख्या बहुत बढ़ गई थी । नदियों का जल स्वच्छ हो गया । आकाश के स्वच्छ होते ही तारों का प्रकाश भी अधिक हो गया । सर्वत्र मृग और पक्षी कलरव करने लगे । महात्मा पाण्डवों के लिए यह शरद ऋतु अत्यन्त सुखदायी थी ॥10-11॥
 
After that, the joyous autumn season arrived. Birds like crows and swans started roaming around. Kasa, Kush etc. had increased a lot in the forests and on the mountain peaks. The water of the rivers became clean. As the sky became clear, the light of the stars became brighter. Deer and birds started chirping everywhere. This autumn season was very pleasant for Mahatma Pandavas. 10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)