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mahabharat 3.181.6: हे महाधनुर्धर भूपाल! इसी प्रकार कहीं-कहीं तो अहिंसा का महत्व प्रेमयुक्त वचनों से भी अधिक देखा जाता है और कहीं-कहीं तो प्रेमयुक्त वाणी का महत्व अहिंसा से भी अधिक देखा जाता है। 6॥   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.181.6 
एवमेव महेष्वास प्रियवाक्यान्महीपते।
अहिंसा दृश्यते गुर्वी ततश्च प्रियमिष्यते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे महाधनुर्धर भूपाल! इसी प्रकार कहीं-कहीं तो अहिंसा का महत्व प्रेमयुक्त वचनों से भी अधिक देखा जाता है और कहीं-कहीं तो प्रेमयुक्त वाणी का महत्व अहिंसा से भी अधिक देखा जाता है। 6॥
 
Great archer Bhupal! Similarly, at some places the importance of non-violence is seen more than that of loving words and at some places the importance of loving speech is seen to be even greater than that of non-violence. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)