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सर्प उवाच
दानं च सत्यं तत्त्वं वा अहिंसा प्रियमेव च।
एषां कार्यगरीयस्त्वाद् दृश्यते गुरुलाघवम्॥ ४॥
अनुवाद
सर्प ने कहा - महाराज! दान, सत्य, अहिंसा और मधुर वाणी - इनकी महानता और लघुता का निर्णय कार्य की महत्ता के अनुसार होता है ॥4॥
The snake said - Maharaj! Charity, truthfulness, non-violence and sweet speech - their greatness and smallness are judged according to the importance of the work. ॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥