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mahabharat 3.181.4: सर्प ने कहा - महाराज! दान, सत्य, अहिंसा और मधुर वाणी - इनकी महानता और लघुता का निर्णय कार्य की महत्ता के अनुसार होता है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.181.4 
सर्प उवाच
दानं च सत्यं तत्त्वं वा अहिंसा प्रियमेव च।
एषां कार्यगरीयस्त्वाद् दृश्यते गुरुलाघवम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सर्प ने कहा - महाराज! दान, सत्य, अहिंसा और मधुर वाणी - इनकी महानता और लघुता का निर्णय कार्य की महत्ता के अनुसार होता है ॥4॥
 
The snake said - Maharaj! Charity, truthfulness, non-violence and sweet speech - their greatness and smallness are judged according to the importance of the work. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)