Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.181.37: जब स्वर्ग में अगस्त्य मुनि मेरी पालकी उठाकर ले जा रहे थे, तब मैंने उन्हें लात मारी थी; इसलिए उन्होंने मुझसे कहा था, ‘तू अवश्य ही सर्प बन जाएगा।’ ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.181.37 
तत्र ह्यगस्त्य: पादेन वहन् स्पृष्टो मया मुनि:।
अगस्त्येन ततोऽस्म्युक्त: सर्पस्त्वं च भवेति ह॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जब स्वर्ग में अगस्त्य मुनि मेरी पालकी उठाकर ले जा रहे थे, तब मैंने उन्हें लात मारी थी; इसलिए उन्होंने मुझसे कहा था, ‘तू अवश्य ही सर्प बन जाएगा।’ ॥37॥
 
When the sage Agastya was carrying my palanquin in heaven, I kicked him; therefore he said to me, 'You will certainly become a serpent.' ॥37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)