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mahabharat 3.181.35: महाराज! उन दिनों मैं जब भी किसी को देखता, उसकी चमक तुरंत छीन लेता। मेरी दृष्टि में ऐसी शक्ति थी।   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.181.35 
चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते।
तस्य तेजो हराम्याशु तद्धि दृष्टेर्बलं मम॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उन दिनों मैं जब भी किसी को देखता, उसकी चमक तुरंत छीन लेता। मेरी दृष्टि में ऐसी शक्ति थी।
 
King! In those days, whenever I looked at someone, I would instantly take away his brilliance. Such was the power of my sight.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)