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mahabharat 3.181.32: परंतप महाराज! आज आपने मेरी बड़ी कृपा की है। इस समय आप जैसे महापुरुष से बात करने के कारण मेरा अत्यंत दुःखदायी शाप दूर हो गया है।॥32॥   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.181.32 
कृतं कार्यं महाराज त्वया मम परंतप।
क्षीण: शाप: सुकृच्छ्रो मे त्वया सम्भाष्य साधुना॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
परंतप महाराज! आज आपने मेरी बड़ी कृपा की है। इस समय आप जैसे महापुरुष से बात करने के कारण मेरा अत्यंत दुःखदायी शाप दूर हो गया है।॥32॥
 
Parantapa Maharaj! Today you have done a great service to me. Because of talking to a great person like you at this time, my very painful curse has been removed. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)