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mahabharat 3.181.31: युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं भी धन के मोह में मदमस्त हो गया था और जब मैं गिर चुका था, तब मुझे होश आया था। अतः अब मैं तुम्हें सावधान कर रहा हूँ॥ 31॥   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.181.31 
सोऽहमैश्वर्यमोहेन मदाविष्टो युधिष्ठिर।
पतित: प्रतिसम्बुद्धस्त्वां तु सम्बोधयाम्यहम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं भी धन के मोह में मदमस्त हो गया था और जब मैं गिर चुका था, तब मुझे होश आया था। अतः अब मैं तुम्हें सावधान कर रहा हूँ॥ 31॥
 
Yudhishthira! Similarly, I too became intoxicated by the love of wealth and I became conscious when I had already fallen. So, I am warning you now.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)