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mahabharat 3.181.2: सर्प बोला - हे भारत! इस विषय में मेरा विचार यह है कि मनुष्य सुपात्रों को दान देकर, सत्य और प्रिय वचन बोलकर तथा अहिंसा धर्म में तत्पर रहकर स्वर्ग (परम गति) प्राप्त कर सकता है।   |   mahabharat अध्याय 3.181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 181: युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.181.2 
सर्प उवाच
पात्रे दत्त्वा प्रियाण्युक्त्वा सत्यमुक्त्वा च भारत।
अहिंसानिरत: स्वर्गं गच्छेदिति मतिर्मम॥ २॥
 
 
अनुवाद
सर्प बोला - हे भारत! इस विषय में मेरा विचार यह है कि मनुष्य सुपात्रों को दान देकर, सत्य और प्रिय वचन बोलकर तथा अहिंसा धर्म में तत्पर रहकर स्वर्ग (परम गति) प्राप्त कर सकता है।
 
The snake said – India! My view on this matter is that a person can attain heaven (highest state) by giving donations to worthy people, speaking truth and loving words and being active in the religion of non-violence. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)