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mahabharat 3.180.6: सर्प बोला - हे राजन! यह राजकुमार स्वयं मेरे मुख में आकर मेरा आहार बन गया है। आप जाइए, यहाँ रुकना उचित नहीं है; अन्यथा कल तक आप भी मेरा आहार बन जाएँगे।   |   mahabharat अध्याय 3.180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.180.6 
सर्प उवाच
आहारो राजपुत्रोऽयं मया प्राप्तो मुखागत:।
गम्यतां नेह स्थातव्यं श्वो भवानपि मे भवेत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सर्प बोला - हे राजन! यह राजकुमार स्वयं मेरे मुख में आकर मेरा आहार बन गया है। आप जाइए, यहाँ रुकना उचित नहीं है; अन्यथा कल तक आप भी मेरा आहार बन जाएँगे।
 
The snake said - O King! This prince has come to my mouth himself and has come to me as food. You go, it is not right to stay here; otherwise by tomorrow you too will become my food.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)