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mahabharat 3.180.24: हे मनुष्यों के स्वामी! आपने यहाँ जिस ज्ञेय तत्त्व का वर्णन किया है, वह दुःख और सुख से परे है। मैं दुःख और सुख से रहित किसी अन्य वस्तु का अस्तित्व नहीं देखता हूँ।॥24॥   |   mahabharat अध्याय 3.180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.180.24 
वेद्यं यच्चात्र निर्दु:खमसुखं च नराधिप।
ताभ्यां हीनं पदं चान्यन्न तदस्तीति लक्षये॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! आपने यहाँ जिस ज्ञेय तत्त्व का वर्णन किया है, वह दुःख और सुख से परे है। मैं दुःख और सुख से रहित किसी अन्य वस्तु का अस्तित्व नहीं देखता हूँ।॥24॥
 
O Lord of men! The knowable principle which you have described here is beyond sorrow and happiness. I do not see the existence of any other thing which is devoid of sorrow and happiness. ॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)