Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.180.13-15: फिर उस धन को पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया। मैंने हजारों ब्राह्मणों से अपनी पालकी उठवाई। तत्पश्चात् धन के मद में चूर होकर मैंने अनेक ब्राह्मणों का अपमान किया। हे पृथ्वी के स्वामी! इससे कुपित होकर महर्षि अगस्त्य ने मुझे इस अवस्था में पहुँचा दिया। हे पाण्डवराज! उन्हीं महामुनि अगस्त्य की कृपा से आज तक मेरी स्मृति मुझसे दूर नहीं हुई। (मेरी स्मृति ज्यों की त्यों बनी हुई है)॥13-15॥ | mahabharat अध्याय 3.180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
फिर उस धन को पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया। मैंने हजारों ब्राह्मणों से अपनी पालकी उठवाई। तत्पश्चात् धन के मद में चूर होकर मैंने अनेक ब्राह्मणों का अपमान किया। हे पृथ्वी के स्वामी! इससे कुपित होकर महर्षि अगस्त्य ने मुझे इस अवस्था में पहुँचा दिया। हे पाण्डवराज! उन्हीं महामुनि अगस्त्य की कृपा से आज तक मेरी स्मृति मुझसे दूर नहीं हुई। (मेरी स्मृति ज्यों की त्यों बनी हुई है)॥13-15॥
Then, on getting that wealth, my ego increased. I made thousands of Brahmins carry my palanquin. Thereafter, being intoxicated with wealth, I insulted many Brahmins. O lord of the earth! Enraged by this, Maharishi Agastya brought me to this state. O king of Pandavas! Due to the grace of that same great Agastya, my memory has not left me till today. (My memory has remained as it is)॥13-15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥