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mahabharat 3.180.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सर्प के शरीर में बंधे हुए अपने प्रिय भाई भीमसेन के पास पहुँचकर परम बुद्धिमान युधिष्ठिर ने उनसे इस प्रकार पूछा -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 180: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.180.1 
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम्।
दयितं भ्रातरं धीमानिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सर्प के शरीर में बंधे हुए अपने प्रिय भाई भीमसेन के पास पहुँचकर परम बुद्धिमान युधिष्ठिर ने उनसे इस प्रकार पूछा -॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On reaching his dear brother Bhimasena who was bound in the body of a serpent, the extremely intelligent Yudhishthira asked him thus:॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)