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mahabharat 3.18.9: हे आयुष्मान! मुझे सदैव आपकी रक्षा करनी है और आपको भी मेरी रक्षा करनी है। सारथी की रक्षा सदैव सारथी द्वारा ही की जानी चाहिए। इसी कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए मैं युद्धभूमि से लौट रहा हूँ।   |   mahabharat अध्याय 3.18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.18.9 
आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाप्यहम्।
रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वापयाम्यहम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे आयुष्मान! मुझे सदैव आपकी रक्षा करनी है और आपको भी मेरी रक्षा करनी है। सारथी की रक्षा सदैव सारथी द्वारा ही की जानी चाहिए। इसी कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए मैं युद्धभूमि से लौट रहा हूँ।
 
O Ayushman! I must always protect you and you must always protect me. A charioteer must always be protected by his charioteer. Keeping this duty in mind, I am returning from the battlefield.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)