श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.18.7 
सौतिरुवाच
जानार्दने न मे मोहो नापि मां भयमाविशत्।
अतिभारं तु ते मन्ये शाल्वं केशवनन्दन॥ ७॥
 
 
अनुवाद
सारथिपुत्र ने कहा, "हे जनार्दन! न तो मैं मोहित हूँ और न ही मेरे मन में कोई भय है। हे केशवनपुत्र! मुझे ऐसा लगता है कि यह राजा शाल्व आपके लिए बहुत बड़ा भार बन रहा है।"
 
The son of a charioteer said, "O son of Janardan, neither am I infatuated nor is there any fear in my mind. O son of Kesavan, I feel that this King Shalva is becoming a great burden for you. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)