श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.18.5 
सौते किं ते व्यवसितं कस्माद् यासि पराङ्मुख:।
नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'हे सारथिपुत्र! आज तुमने क्या सोचा है? तुम युद्ध से क्यों भाग रहे हो? युद्ध से भागना वृष्णिवंश के योद्धाओं का कर्तव्य नहीं है।'
 
‘Son of a charioteer! What have you thought today? Why are you running away from the battle? Fleeing from the battle is not the duty of the warriors of the Vrishni clan. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)