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mahabharat 3.18.33: दारुककुमार! युद्धभूमि का परित्याग करना तुम्हारे लिए कदापि उचित नहीं था। विशेषकर उस समय, जब मैं युद्ध करना चाहता था। अतः तुम उस स्थान पर जाओ जहाँ युद्ध हो रहा है।॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.18.33 
न युक्तं भवता त्यक्तुं संग्रामं दारुकात्मज।
मयि युद्धार्थिनि भृशं स त्वं याहि यतो रणम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
दारुककुमार! युद्धभूमि का परित्याग करना तुम्हारे लिए कदापि उचित नहीं था। विशेषकर उस समय, जब मैं युद्ध करना चाहता था। अतः तुम उस स्थान पर जाओ जहाँ युद्ध हो रहा है।॥33॥
 
‘Darukkumar! It was never right for you to abandon the battlefield. Especially at that time, when I desired to fight. So, go to the place where the war is taking place.’॥ 33॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने अष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)