श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.18.32 
कदापि सूतपुत्र त्वं जानीषे मां भयार्दितम्।
अपयातं रणं हित्वा यथा कापुरुषं तथा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे सारथिपुत्र! क्या तू यह समझता है कि मैं कायर हूँ, भयभीत हूँ और युद्ध से भाग गया हूँ?॥ 32॥
 
‘Son of a charioteer, do you think that I am a coward, overcome with fear, and have fled from the battle?॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)