श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.18.31 
न जीवितमहं सौते बहु मन्ये कथंचन।
अपयातो रणाद् भीत: पृष्ठतोऽभ्याहत: शरै:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'सारथिपुत्र! जो पीठ पर बाण लगने पर युद्ध से भयभीत होकर भागता है, उसके जीवन को मैं अधिक महत्व नहीं देता॥31॥
 
'Son of a charioteer! I do not give any more respect to the life of one who flees from the battle in fear after being struck by arrows on his back.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)