श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.18.30 
स निवर्त रथेनाशु पुनर्दारुकनन्दन।
न चैतदेवं कर्तव्यमथापत्सु कथंचन॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'दारुकनंदन! इसलिए आप शीघ्र ही रथ द्वारा युद्धभूमि में लौट जाएँ। आज से यदि मुझे कोई संकट भी आए, तो भी आप ऐसा व्यवहार न करें।'
 
'Darukanandan! Therefore you should return to the battlefield quickly by chariot. From today onwards, even if I face any danger, you should not behave in such a manner. 30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)