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mahabharat 3.18.29: 'सारथिपुत्र! मैं, जो तुम्हारे द्वारा युद्धभूमि से दूर ले जाया गया हूँ, किसी भी प्रकार इस युद्ध को त्यागकर पीठ पर बाणों के घाव खाकर असहाय जीवन नहीं जीऊँगा।'   |   mahabharat अध्याय 3.18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.18.29 
त्यक्त्वा रणमिमं सौते पृष्ठतोऽभ्याहत: शरै:।
त्वयापनीतो विवशो न जीवेयं कथंचन॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'सारथिपुत्र! मैं, जो तुम्हारे द्वारा युद्धभूमि से दूर ले जाया गया हूँ, किसी भी प्रकार इस युद्ध को त्यागकर पीठ पर बाणों के घाव खाकर असहाय जीवन नहीं जीऊँगा।'
 
'Son of a charioteer! I, who have been brought away from the battle-field by you, will not in any way abandon this war and live a helpless life, having received wounds on the back from arrows.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)