श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.18.28 
सात्यकिं बलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णय:।
मया स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘मैं सात्यकि, बलराम, अंधक तथा वृष्णिवंश के अन्य वीरों से क्या कहूँ, जो सदैव मुझसे प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं?॥ 28॥
 
‘What shall I say to Satyaki, to Balarama, to Andhaka and to the other heroes of the Vrishni clan, who always compete with me?॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)