श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.18.24 
भारं हि मयि संन्यस्य यातो मधुनिहा हरि:।
यज्ञं भारतसिंहस्य न हि शक्योऽद्य मर्षितुम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'मेरे पिता मधुसूदन भगवान श्रीहरि इस स्थान की रक्षा का सम्पूर्ण भार मुझ पर छोड़कर भरतवंश के रत्न धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ में सम्मिलित होने चले गए हैं। (आज मैंने जो अपराध किया है,) उसके लिए वे मुझे कभी क्षमा नहीं कर सकेंगे।॥ 24॥
 
'My father Madhusudan Lord Shri Hari has left the entire responsibility of protecting this place on me and has gone to attend the yagna of Dharmaraj Yudhishthira, the jewel of the Bharat dynasty. (The crime I have committed today,) he will never be able to forgive me.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)