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mahabharat 3.18.21: मैं वीर, आदरणीय, शान्तचित्त और सदैव अपने को शूरवीर मानता हूँ। मुझे देखकर (युद्ध से भागकर) बड़ी संख्या में एकत्रित हुए वीर योद्धाओं की पत्नियाँ मुझसे क्या कहेंगी?॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 3.18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.18.21 
शूरं सम्भावितं शान्तं नित्यं पुरुषमानिनम्।
स्त्रियश्च वृष्णिवीराणां किं मां वक्ष्यन्ति संहता:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
मैं वीर, आदरणीय, शान्तचित्त और सदैव अपने को शूरवीर मानता हूँ। मुझे देखकर (युद्ध से भागकर) बड़ी संख्या में एकत्रित हुए वीर योद्धाओं की पत्नियाँ मुझसे क्या कहेंगी?॥ 21॥
 
'I am considered to be a brave man, respectable, calm and always consider myself a valiant man. What will the wives of the brave warriors, who have gathered in large numbers after seeing me (after fleeing from the battle), say to me?॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)