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mahabharat 3.18.10: महाबाहो! आप अकेले हैं और ये राक्षस बहुत अधिक हैं। रुक्मिणीनन्दन! इस युद्ध में इतने सारे विरोधियों का सामना करना आपके लिए अकेले कठिन है; ऐसा सोचकर मैं युद्ध से पीछे हट रहा हूँ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 18: मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.18.10 
एकश्चासि महाबाहो बहवश्चापि दानवा:।
न समं रौक्मिणेयाहं रणे मत्वापयामि वै॥ १०॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! आप अकेले हैं और ये राक्षस बहुत अधिक हैं। रुक्मिणीनन्दन! इस युद्ध में इतने सारे विरोधियों का सामना करना आपके लिए अकेले कठिन है; ऐसा सोचकर मैं युद्ध से पीछे हट रहा हूँ॥10॥
 
Mahabaho! You are alone and these demons are very numerous. Rukmininandan! It is difficult for you alone to face so many opponents in this war; thinking this, I am withdrawing from the war.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)